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75 साल बाद भी अगड़ी जातियों के लेवल पर नहीं SC-ST, जानें सुप्रीम कोर्ट में क्या बोली सरकार

नई दिल्ली केंद्र सरकार ने 19 मंत्रालयों का डेटा सामने रखते हुए सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की मौजूदगी अब भी पर्याप्त नहीं है। सरकार ने बताया कि इन मंत्रालयों में कुल वर्कफोर्स 1,23,155 है जिसमें SC का 15.34%, एसटी का 6.18% और ओबीसी का 17.5 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है। दरअसल, एक दिन पहले सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि प्रमोशन में आरक्षण देने के फैसले को उचित ठहराने के लिए वह केंद्र सरकार में एससी और एसटी के प्रतिनिधित्व का डेटा पेश करे। एडिशनल सॉलिसिटर जनरल बलबीर सिंह ने जस्टिस एल नागेश्वर राव, संजीव खन्ना और बीआर गवई की पीठ को बताया कि केवल 19 मंत्रालयों का डेटा कंपाइल किया जा सका है। उन्होंने कोर्ट को आश्वस्त भी किया कि आने वाले कुछ दिनों में SC और ST के प्रतिनिधित्व पर ज्यादा व्यापक आंकड़े पेश किए जाएंगे। इससे पहले, अटॉर्नी जनरल ने बेंच को बताया कि केंद्र सरकार के अंतर्गत 53 विभाग हैं और उनमें 5000 कैडर हैं। 19 मंत्रालयों के डेटा, एससी 15.34 प्रतिशत सिंह ने बुधवार को कोर्ट को बताया कि 19 मंत्रालयों के आंकड़े इकट्ठा किए गए जिसमें अनुसूचित जाति के 18,898 यानी 15.34 प्रतिशत, 7608 यानी 6.18 प्रतिशत एसटी और 21656 यानी 17.5 प्रतिशत ओबीसी हैं। उन्होंने यह भी साफ किया कि डेटा में कुछ विसंगतियां भी हैं क्योंकि जनरल लिस्ट में नौकरी पाने वाले एससी और एसटी कर्मचारियों को भी शामिल किया गया है। इतना ही नहीं, अलग-अलग क्लास में प्रतिनिधित्व भिन्न हैं जैसे क्लास 3 और 4 में प्रतिनिधित्व ज्यादा है लेकिन क्लास 1 में काफी कम है। उन्होंने कोर्ट से कहा कि क्लास के आधार पर डेटा बेंच के समक्ष जल्द रखा जाएगा। 75 साल बाद भी अगड़ी जातियों के स्तर पर नहीं केंद्र ने SC से बुधवार को कहा कि हकीकत यह है कि करीब 75 साल बाद भी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को योग्यता के उस स्तर पर नहीं लाया जा सका है, जिस पर अगड़ी जातियां हैं। अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने बेंच से कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित लोगों के लिए समूह ए श्रेणी की नौकरियों में उच्च पद प्राप्त करना अधिक कठिन है और अब समय आ गया है, जब शीर्ष अदालत को रिक्त पदों को भरने के लिए एससी, एसटी और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए कुछ ठोस आधार देना चाहिए। कोर्ट ने कहा था, पदोन्नति में आरक्षण को चुनौती दी गई तो... इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र से पूछा था कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के कर्मचारियों को पदोन्नति में आरक्षण देने के फैसले को उचित ठहराने के लिए उसने किस तरह के कदम उठाए हैं। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और न्यायमूर्ति बी आर गवई की पीठ ने कहा कि यदि किसी नौकरी के विशेष संवर्ग में एससी और एसटी को पदोन्नति में आरक्षण को न्यायिक चुनौती दी जाती है तो सरकार को इसे इस आधार पर उचित ठहराना होगा कि किसी विशेष संवर्ग में उनका अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है और कोटा प्रदान करने से समग्र प्रशासनिक दक्षता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। सुनवाई की शुरुआत में ही केंद्र की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने 1992 के इंद्रा साहनी मामले (जिसे मंडल आयोग मामले के रूप में जाना जाता है) से लेकर 2018 के जरनैल सिंह मामले में शीर्ष अदालत के फैसलों का जिक्र किया। मंडल फैसले में पदोन्नति में आरक्षण से इनकार किया गया था। 1975 तक का हाल मंगलवार को अटॉर्नी जनरल ने कहा कि 1975 तक 3.5 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 0.62 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति सरकारी नौकरियों में थे और यह औसत आंकड़ा है। उन्होंने कहा अब 2008 में सरकारी रोजगार में एससी और एसटी का आंकड़ा क्रमशः 17.5 और 6.8 प्रतिशत हो गया है, जो अब भी कम है और इस तरह के कोटा को उचित ठहराते हैं। इससे पहले, शीर्ष अदालत ने 14 सितंबर को कहा था कि वह एससी और एसटी को पदोन्नति में आरक्षण देने के अपने फैसले को फिर से नहीं खोलेगा क्योंकि यह राज्यों को तय करना है कि वे इसे कैसे लागू करते हैं। पीठ ने कहा, ‘हम यह स्पष्ट कर रहे हैं कि हम नागराज या जरनैल सिंह (मामलों) को फिर से खोलने नहीं जा रहे हैं क्योंकि विचार केवल इन मामलों को अदालत द्वारा निर्धारित कानून के अनुसार तय करना था।’


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75 साल बाद भी अगड़ी जातियों के लेवल पर नहीं SC-ST, जानें सुप्रीम कोर्ट में क्या बोली सरकार 75 साल बाद भी अगड़ी जातियों के लेवल पर नहीं SC-ST, जानें सुप्रीम कोर्ट में क्या बोली सरकार Reviewed by Fast True News on October 06, 2021 Rating: 5

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