Kisan Andolan: एक तरफ किसान तो दूसरी तरफ जवान...कर्तव्य धर्म के साथ कुछ यूं रिश्ता भी निभा रहे दोनों
नई दिल्ली महाभारत के युद्ध के दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में अपने ही रिश्तेदारों के सामने खड़े हुए अर्जुन के सामने जो धर्मसंकट खड़ा हुआ था, कुछ ऐसा ही हाल इन दिनों दिल्ली के बॉर्डर पर डटे किसानों और जवानों का है। ये आमने-सामने आकर भी अपनी-अपनी ड्यूटी निभा रहे हैं। अब इनके बीच कंटीली तारों और नुकीली कीलों की अभेद्य दीवार भी आ गई है। इनकी अपनी मजबूरियां हैं लेकिन न तो इनका रिश्ता कमजोर हुआ है और न रिश्ते की वजह से ये झुके हैं। कोई पुलिसकर्मी यहां गांव के किसान चाचा को ठंड से बचाने के लिए चादर दे रहा है तो कोई किसान भाई पुलिसवाले को गांव से लाया हुआ गुड़। फिलहाल दोनों ओर से रिश्तों की मिठास बरकरार रखने की पूरी कोशिश जारी है। दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर डटे कुछ किसानों और पुलिसकर्मियों के बीच जाकर माहौल का हाल बता रहे हैं नीतेश सिन्हा: गाजीपुर बॉर्डर पर आमने-सामने दिल्ली को यूपी के गाजियाबाद से जोड़ते गाजीपुर बॉर्डर पर पुलिस के जवान और किसान आमने-सामने हैं। नए कृषि कानून को वापस लेने की मांग पर चल रहा आंदोलन तेज होता जा रहा है। यहां किसानों को अपना ठिकाना बनाए हुए दो महीने से ज्यादा वक्त हो गया है। इस दौरान आंदोलन स्थल पर कई मानवीय तस्वीरें भी दिखती हैं। कई बार किसानों और पुलिस के बीच टकराव की स्थिति भी बनी। हालात बेहद तनावपूर्ण भी हुए लेकिन इस समय का सूरत-ए-हाल यह है कि दोनों ही पक्ष अपने फर्ज से बंधे हैं। यहां सुरक्षाबलों के जवान अधिकतर पश्चिमी और पूर्वी उत्तर प्रदेश या हरियाणा के किसान परिवारों से ताल्लुक रखते हैं। जो जवान ड्यूटी कर रहे हैं तो उनके घर का, गांव का या पड़ोस के गांव का कोई न कोई किसान यहां नारे लगाता दिख जाता है। वहीं किसान के सामने पुलिस की वर्दी में खड़ा उनका रिश्तेदार उन्हें रोकने की कोशिश करता है। यहां एक तरफ फुटपाथ के ऊपर कुर्सियों का घेरा बनाकर पुलिसकर्मी बैठे हुए हैं। पास ही अपने अफसर को घेरे कुछ सिपाही भी खड़े हैं। बगल में सिपाही का डंडा कुर्सी का सहारा लिए जमीन को छू रहा है। बातचीत होती है तो कुछ लोग अपनी कहानी सुनाते हैं। 'ऐसी नौबत न आए कि अपनों पर लाठी चलानी पड़े' गजरौला से आया सिपाही: मेरे गांव से काफी किसान आए हैं। कुछ को यहीं रहते दो महीने बीत गए हैं तो कई किसान ऐसे हैं जो बीच-बीच में कुछ वक्त के लिए घर भी हो आते हैं। हालांकि मेरे अपने परिवार से कोई नहीं आया है लेकिन वहां तो पूरा गांव हमारा परिवार ही होता है। छोटी-सी सफलता पर भी पूरा गांव कंधों पर उठा लेता है। गांव में आपस में भी कई रिश्तेदारियां है। अब यहां बैठकर हम यह तो समझते हैं कि किसान और जवान आमने-सामने हैं और यह नौबत कतई न आए कि अपने लोगों पर लाठी चलानी पड़े। दिली इच्छा तो यही है कि किसानों की पूरी बात सुनी जाए और सरकार यह विवाद खत्म करे। 'मैंने खिलाई रोटी तो किसान भाई ने खिलाया गुड़'गजरौला से दूसरा सिपाही : गांव से आए किसान भाई हमारा हाल-चाल पूछते रहते हैं। सारा दिन यहां बैठे रहते हैं तो थोड़ी हंसी-ठिठोली भी हो जाती है, दिल हल्का हो जाता है। फिलहाल यहां सबकुछ शांत है इसलिए दिनभर सिर्फ बैठे रहते हैं। लंबी ड्यूटी से थकान हो जाती है। मैं अपने किसान भाई को दो बार घर से बनी रोटी-सब्जी लाकर खिला चुका हूं। वह इतनी दूर से यहां आया है। वह मुझे गांव का गुड़ खिला देता है। दोनों भाई एक-साथ खाना खाकर साथ-साथ पानी पीते हैं तो दिल को ठंडक और शरीर को ताजगी से मिलती है। 'गांव के चाचा को चादर दी ताकि ठंड में सो पाएं'गजरौला से तीसरा सिपाही : मैंने यहां अपने गांव से आए बुजुर्ग किसान चाचा को मोटी चादर लाकर दी ताकि ठंड में रात आराम से कट सके। चाचा आंदोलन में आने की जल्दीबाजी में कपड़े लाना भूल गए थे। हालांकि बाद में गांव से आए लोगों ने उन्हें घर से पहनने-ओढ़ने के लिए कपड़े लाकर दे दिए हैं। उन्हें कोई परेशानी नहीं हो रही - यह देखकर तसल्ली मिल जाती है। कई बार कनेक्टिविटी की दिक्कत आती है और यहां फोन नहीं लग पाता तो चाचा के घर से सीधे मेरे फोन पर कॉल आती है। उनका हालचाल पूछने के लिए। सब कहते हैं कि चाचा दिल्ली में हैं इसलिए तुम उनका ध्यान रखना। हमारा आपस में क्या झगड़ा? बस किसान और जवान में टकराव न हो। 'रिटायरमेंट के बाद मैं भी खेती ही करूंगा'बागपत का पुलिसकर्मी: कुछ महीनों बाद मेरी रिटायरमेंट है। हमारे बागपत के काफी में आए हैं। वैसे यह सच है कि यह किसान आंदोलन पश्चिमी यूपी वालों ने ही खड़ा किया है। किसान और पुलिस के बीच टकराव की बात सोच भी नहीं सकता, ये अपने भाई हैं। ऐसा कभी न हो। अपनों पर लाठी चले तो दुख ही होगा। इनकी बात जायज हो सकती है इसीलिए तो यहां इतने दिन से डटे हुए हैं। तब से हम उनका और वे हमारा ख्याल भी रख रहे हैं। दिल्ली पुलिस में भी हमारे कई साथी हैं। वे भी इसी बात को लेकर परेशान हैं कि उनके हरियाणा से कई किसान आए हुए हैं। वे भी ड्यूटी निभा रहे हैं। अब तक तो यहां पर सब कुछ शांति से निपट रहा है। बस आगे भी यूं ही कट जाए। रिटायरमेंट के बाद मैं भी खेती करूंगा। नौकरी में रहते हुए बहुत समय गांव से और अपने शहर से बाहर ही रहा हूं। तब मेरे भाइयों ने मेरे हिस्से के खेत की देखरेख की। अब अपने खेत पर लौटकर पूरा समय दूंगा। 'दामाद दिल्ली पुलिस में है, मुझे समझाता है' मेरठ का किसान: मैं मेरठ का किसान हूं। अपने गांव के बाकी लोगों के साथ आया हूं। इतना तो मैं भी समझता हूं कि सरकार ने कई बार किसानों से बात की है लेकिन कुछ मुद्दे हैं जो सुलझ नहीं पा रहे। जल्दी से यह विवाद खत्म हो तो हम भी घर चलें। यहां दिल्ली में मेरी बेटी की ससुराल है। दामाद दिल्ली पुलिस में हैं। जब उनको पता चला तो यहां मुझे समझाने आए कि आप आंदोलन में क्यों आ गए। यहां लाठीचार्ज हुआ या कोई हंगामा हुआ तो चोट लग जाएगी। पर जब मैं अपने साथियों के साथ आया हूं तो उनके साथ ही वापस लौटूंगा। वैसे मुझे लगता है कि अब मामला लंबा खिंच रहा है, इसका जल्द ही कोई हल निकलना चाहिए। 'रिश्ते की नजाकत है, फर्ज निभा रहा हूं' बड़ौत का सिपाही: मैं अपनी वर्दी का फर्ज निभा रहा हूं। लेकिन इस बात का दुख है कि हमारा किसान भाई इस सर्दी में महीनों से सड़क पर पतली चादरों पर सो रहा हैं। देखकर दिल में दर्द होता है। अब यही इच्छा है कि सरकार किसानों की कुछ बातों को मानकर बड़ा दिल दिखाए। भले ही यूपी गेट बॉर्डर पर दिल्ली के दूसरे बॉर्डर की तरह बहुत अधिक टकराव की स्थिति तो नहीं बनी लेकिन जब-जब यहां तनाव बढ़ा तो हालत को काबू करने के लिए अपना फर्ज निभाना पड़ा। इस बीच, कई बार गांव के लोग सामने से आवाज उठाते दिखे। ऐसे में उन्हें समझा-बुझाकर किनारे ले जाना पड़ा। वे भी हमें देखकर कुछ सेकंड के लिए चुप हो जाते हैं। फिर हल्की मुस्कान देते और फिर अपनी नजर झुकाकर किनारे हो जाते। ऐसा नहीं है कि वे हमारी पीड़ा को नहीं समझते, लेकिन वे भी मजबूर हैं। कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि दोनों को एक-दूसरे के सामने हाथ जोड़कर निकलना पड़ता है। यही इस रिश्ते ही नजाकत है, जिसे हम और हमारे किसान भाई समझ रहे हैं। इतना ही नहीं, जब माहौल में थोड़ी नरमी आ जाती है तो फिर किसी कोने में चाय की चुस्की लगा लेते हैं। कभी अलाव जलाकर हालात पर चर्चा कर सब कुछ ठीक होने की बात कहकर काम में जुट जाते हैं। 'वे हमारा दर्द समझते हैं, हम उनका' पीलीभीत का पुलिसकर्मी: मेरा पूरा परिवार खेती से जुड़ा है। सबके पास भले ही जमीन बहुत बड़ी नहीं है लेकिन है किसान का परिवार ही। गांव के काफी लोग आंदोलन स्थल में आए हुए हैं। जब गाजियाबाद में ड्यूटी लगी और फिर अचानक आंदोलन में मुलाकात हुई तो काफी देर तक एक-दूसरे को देखते रहे, गले मिले और बातचीत हुई। ड्यूटी की वजह से जल्दी-जल्दी गांव जाने की छुट्टी नहीं मिल पाती थी। लेकिन यहां अब रोजाना मिल लेते हैं। आंदोलन पर चर्चा होती है। वे हमारा दर्द समझते हैं और हम उनका। फिर राम-राम कर आगे निकल जाते हैं। अगर टकराव होने की स्थिति आने पर बलप्रयोग करना पड़ेगा तो हम क्या कर सकते हैं। हम क्या हमारे जैसे कई पुलिस के जवान इसी तरह से रिश्ते और फर्ज की डोर से बंधे हुए हैं। जब रात में ड्यूटी लगती है तो कुछ घंटे साथ बैठकर गांव और परिवार की बातों को याद कर लेते हैं। मैं यही चाहता हूं कि सबकुछ शांति से खत्म हो जाए और लोग अपने-अपने घरों को लौट जाएं।
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Kisan Andolan: एक तरफ किसान तो दूसरी तरफ जवान...कर्तव्य धर्म के साथ कुछ यूं रिश्ता भी निभा रहे दोनों
Reviewed by Fast True News
on
February 06, 2021
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