खेती कानून किसानों के लिए कैंसर, खत्म करके दम लेंगे: राकेश टिकैत
भील शैली के चित्रों के लिए मशहूर भूरीबाई को पद्मश्री पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है। वे पहली भील महिला हैं जिन्होंने कागज और कैनवास पर अपने अनुभवों और जातीय स्मृतियों को दर्ज किया है। 52 वर्षीया भूरीबाई ने भारत भवन में मजदूरी से शुरुआत की और प्रसिद्ध कलाकार जे. स्वामीनाथन के कहने पर कागज पर चित्रों को उकेरना शुरू किया। फिलहाल वे मध्य प्रदेश जनजातीय संग्रहालय, भोपाल से कलाकार के रूप में जुड़ी हैं। उनसे बात की अरविंद दास ने, प्रस्तुत हैं मुख्य अंश : संघर्षों से भरी अपनी लंबी जीवन यात्रा में पद्म पुरस्कार को किस रूप देखती हैं? झाबुआ जिले के छोटे से गांव से मेरी यात्रा शुरू हुई। खुद को यहां तक काफी संघर्ष करके लेकर आई। इस बीच मुझे कुछ अवॉर्ड भी मिले, जैसे शिखर सम्मान, देवी अहिल्या बाई सम्मान, रानी दुर्गावती सम्मान। लेकिन इस अवॉर्ड के बारे में सुनकर मैं बहुत खुश हूं। मैं अपनी कला यहां तक लेकर आई, लेकिन जो नए कलाकार हैं, जिन्हें तलाशा नहीं गया है, जिन्हें कुछ करने का मौका नहीं मिला है, उनको आगे लाने की जरूरत है। मैं सरकार से चाहूंगी कि उनको भी मौका दिया जाए। उनके लिए मैं अपनी कला बांटना चाहूंगी। आप पहली महिला कलाकार हैं जिन्होंने भील शैली को कागज-कैनवास पर अपनाया। देखा-देखी कई और महिला कलाकार इससे जुड़ी हैं। आप इस बारे में क्या कहना चाहेंगी? मेरे जो गुरु हैं, उनका आशीर्वाद मेरे ऊपर है। कोरकू, गोंड, भील कलाकारों के लिए मैं कहना चाहूंगी कि मेरी कला तो प्रशासन ने जान ली, पर मेरी तरह और भी कलाकार आगे बढ़ें। मैं सबके बीच- कलाकारों, उनके बच्चों के बीच अपनी कला बांटना चाहती हूं, उनको बताना चाहती हूं, उनको भी यही सिखा रही हूं।सबसे यही बोलती हूं आप भी अपनी कला लेकर आगे आएं, नाम बढ़ाएं। आनुष्ठानिक पिठौरा पूजा के दौरान जो भित्तिचित्र उकेरा जाता है, उसमें पारंपरिक रूप से पुरुषों का दखल रहा है। आपने इसे कैसे बनाना शुरू किया? मैं आदिवासी भील हूं, हमारे यहां पिठौरा बनता है। पिठौरा देव के घोड़े को महिलाएं, लड़कियां नहीं बनाती हैं। इसे पुरुष ही मिल कर गांव में बनाते हैं। आज भी मैं खास घोड़े को छोड़ कर इस अनुष्ठान से जुड़ी जो अन्य पेंटिंग्स हैं, जैसे पेड़ हैं, मोर हैं, और भी बहुत सी चीजें हैं, वह मैं बनाती हूं। इसके अलावा मैं अपने गांव-घर के जीवन, पेड़-पौधे, जानवरों को अपनी पेंटिंग में बनाती हूं। जे. स्वामीनाथन जब भारत भवन के निदेशक थे, तब उन्होंने आपकी कला और प्रतिभा को पहली बार पहचाना। आप उन्हें किस रूप में याद करती हैं? वे भगवान के पास चले गए, लेकिन मेरे आस-पास, मेर ऊपर देव बनकर वे मेरी सुरक्षा कर रहे हैं। मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं। ऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बांट रहे हैं। मुझे बता रहे हैं। वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूं। कोई भी कला बनाने से पहले मैं उनको याद कर लेती हूं कि मुझे सफल करना। उनके आशीर्वाद से कोई व्यवधान नहीं आया और अपनी पेंटिंग को आगे बढ़ा रही हूं। आपकी पेंटिंग में बिंदियों (डॉट) का ज्यादा प्रयोग मिलता है और रंग भी चटख होते हैं। इसके क्या मायने हैं? जो गोंड पेंटिंग है उसमें कहते हैं कि ये भित्ति चित्र है। गोंड पेंटिंग की पहचान है- लाइनें। उसमें रेखाओं का ज्यादा इस्तेमाल होता है। जो मक्का हमारे यहां उगाया जाता है, वहीं से यह बिंदी आई है। हम जब खेतों में बोअनी करते हैं, या धान बैठाते हैं, उसी दिन से हम ककड़ी, भुट्टा, भिंडी बोअनी करने के बाद खाना छोड़ देते हैं। ये जब पक जाता है, तब हमारे देव को मक्के चढ़ा कर उसके दाने का नवेद रखते हैं। फिर ककड़ी, भिंडी की पूजा करते हैं, तब खाते हैं। यही हमारी पहचान है। पहला अन्न जीवन के लिए है और हम पहले देवों को खिलाएंगे तब खाएंगे। गेरू, नील जैसे रंगों से मैं बचपन से घर की दीवारों को रंगती थी। आस-पास का जीवन मेरी पेंटिंग में उतर आता है। यही चटख रंग मेरी पेंटिंग में उतर आता है।
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खेती कानून किसानों के लिए कैंसर, खत्म करके दम लेंगे: राकेश टिकैत
Reviewed by Fast True News
on
February 08, 2021
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