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'नीतीश को अकेले लड़ना पड़े तो लड़ सकते हैं'

नई दिल्ली राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि इस वक्त जेडीयू और बीजेपी के रिश्तों में सब कुछ सामान्य नहीं है। दोनों के दरम्यान तल्खी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। तीन तलाक और अनुच्छेद-370 जैसे मुद्दों पर जेडीयू सरकार से अपनी असहमति जता चुका है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि दोनों पार्टियों के बीच यह रिश्ता कब तक चलेगा? जेडीयू की राजनीति किस तरफ बढ़ती दिख रही है? क्या नीतीश कुमार अकेले पड़ते जा रहे हैं? ऐसे तमाम सवालों पर जेडीयू के सीनियर नेता और पूर्व डिप्लोमैट पवन वर्मा से एनबीटी नैशनल ब्यूरो के विशेष संवाददाता नरेन्द्र नाथ ने बातचीत की। प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश: जम्मू-कश्मीर से धारा 370 को हटाने की प्रक्रिया को आप किस तरह देखते हैं? हमारा मानना है कि अब जबकि धारा 370 को हटाने का फैसला हो चुका है तो हमें इसे स्वीकार कर लेना चाहिए लेकिन जिस प्रक्रिया से यह हुआ वह हमारे हिसाब से संविधान के खिलाफ है। संविधान की धारा 3 स्पष्ट है कि आप बिना पर्याप्त मशविरा किए और सभी पक्षों को विश्वास में लिए, कोई प्रदेश नहीं बना सकते और न पुराने राज्यों की सरहदें बदल सकते हैं। आप किसी राज्य को तब तक समाप्त नहीं कर सकते जब तक राष्ट्रपति उस राज्य की विधानसभा से राय-विचार न कर लें। जम्मू-कश्मीर में जब असेंबली ही नहीं थी तो राय लेने का सवाल ही कहां उठता है। यह तर्क भी आंशिक रूप से ही सही है कि कि धारा 370 अस्थायी है। यह अस्थायी तो है, लेकिन उसका संवैधानिक कवच रहा है। पूरी प्रक्रिया में जम्मू-कश्मीर के लोगों के साथ कोई संवाद नहीं हुआ जो गलत है। लेकिन अब इन बातों से आगे बढ़ने की जरूरत है। तो आगे का रास्ता किस तरह का दिख रहा है? जिस चतुराई से कानून को पारित किया गया वह तो सरकार की सफलता है लेकिन अब जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति बहाल करना बड़ी चुनौती है। वहां के लोगों को देश की मुख्यधारा से जोड़ना है। इस बात को स्वीकार करना होगा कि वहां आक्रोश है। जम्मू-कश्मीर के लोग कोई पत्थर के पुतले नहीं हैं। इसी देश के नागरिक हैं। हमें अब सबसे पहले इस संदेश पर काम करना चाहिए कि न सिर्फ कश्मीर, कश्मीरी भी हमारे हैं। जेडीयू ने पहले ट्रिपल तलाक पर सरकार का विरोध किया फिर धारा 370 पर। क्या इससे एनडीए में जेडीयू और बीजेपी के बीच दरार बढ़ी है? शुरू से हमारी पार्टी की स्पष्ट राय है कि ऐसे बदलाव और परिवर्तन थोपने नहीं चाहिए। ट्रिपल तलाक में भी यही राय थी। इस तरह के तलाक का हम पुराजोर विरोध करते है। हमने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी स्वागत किया था। हम इस बात के भी पक्षधर थे कि इस कुप्रथा पर रोक लगाने के लिए संसद को कानून लाने की आवश्यकता थी लेकिन कानून कारगर तो हो। मैंने उस मामले में भी कहा कि कानून जल्दबाजी में नहीं लाया जाए। कानून ऐसा हो जिससे मुस्लिम महिलाओं की मदद हो। सिर्फ पुरुष को सजा देना ध्येय न हो। पहले ट्रिपल तलाक और फिर धारा 370 को बहुमत का इस्तेमाल कर जिस तरह लाया गया और संसद से पास कराया गया, वह चिंताजनक जरूर है लेकिन जहां तक गठबंधन का सवाल है तो हम अभी भी एनडीए के हिस्सेदार हैं। खास विषय पर पर हमारी राय अलग है और इसे व्यक्त करने में परहेज नहीं। अब राम मंदिर का मसला भी सामने आ रहा है। उस मुद्दे पर आपकी पार्टी की क्या राय है? हमारी पार्टी की स्पष्ट राय है कि सुप्रीम कोर्ट जो फैसला दे, उसे सभी पक्ष मानें। इस मामले में सरकार को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। राम मंदिर या भगवान राम में हमारी भी भरपूर आस्था है। हम प्रक्रिया में सद्भाव और सहमति चाहते हैं। क्या आपको लगता है कि नई राजनीति में विपक्ष हो या बीजेपी के सहयोगी दल, वे अप्रासंगिक हो गए हैं? लोकतंत्र में कोई अप्रासंगिक नहीं होता। अभी लोकप्रियता और बहुमत के स्तर पर बीजेपी बेहद मजबूत है लेकिन हम समझते हैं लोकतंत्र की खासियत यही है कि इसमें सभी आवाज को सुनने का माद्दा होता है। एक सोच वाला सिस्टम लोकतंत्र नहीं होता है। एक नागरिक या राजनीतिक दल के रूप में अभी आपकी सबसे बड़ी चिंता क्या है? हमारी चिंता है कि ध्रुवीकरण न हो। सभी धर्म-मजहब-विचार की इज्जत हो। ‘जय श्री राम’ जैसे नारे का दुरुपयोग न हो। गोरक्षा के नाम पर हिंसा न हो। हमारी उम्मीद है कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व इन मामलों में जल्दी कुछ कार्रवाई करेगा। क्या कारण है कि नीतीश कुमार बिहार में कभी अकेली ताकत नहीं बन पाए? नीतीश कुमार को अगर अकेले लड़ना पड़े तो लड़ सकते हैं। इसमें कहीं उलझन नहीं है। लेकिन बिहार के विकास के लिए अगर कोई दल सहयोगी बनता है तो इसमें कहीं कोई बुराई नहीं है। 2020 विधानसभा चुनाव में भी नीतीश कुमार ही एनडीए का चेहरा होंगे, इसमें कोई दो राय नहीं।


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'नीतीश को अकेले लड़ना पड़े तो लड़ सकते हैं' 'नीतीश को अकेले लड़ना पड़े तो लड़ सकते हैं' Reviewed by Fast True News on August 21, 2019 Rating: 5

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