शीला के निधन से कांग्रेस के सामने महासंकट
नई दिल्ली तीन बार दिल्ली की मुख्यमंत्री रहीं और गांधी परिवार के वफादारों में शुमार अब इस दुनिया में नहीं हैं। शनिवार को एस्कॉर्ट अस्पताल में उनका निधन हो गया। वह 81 साल की थीं। जैसे ही उनके निधन की खबर आई, दिल्ली में शोक की लहर दौड़ गई। दिल्लीवाले अपनी प्रिय नेता को अपने-अपने तरीके से याद कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर लोग उन्हें 'मॉडर्न दिल्ली की मां' कहकर श्रद्धांजलि दे रहे हैं। शीला का जाना के लिए बड़ा झटका है, खासकर तब जब अगले कुछ महीनों में दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने हैं। शीला को जाता है आधुनिक दिल्ली को बनाने का श्रेय जिनका बचपन दिल्ली में बीता, वे राजधानी में हरियाली बढ़ाने का श्रेय शीला दीक्षित को दे रहे हैं। मेट्रो, फ्लाई ओवर जैसे कई कामों के लिए शीला को आज याद किया जा रहा है। वह भले ही कांग्रेस पार्टी की नेता थीं पर उन्हें हर पार्टी के लोग सम्मान देते थे। शीला को यादकर बीजेपी के सांसद और दिल्ली के पार्टी अध्यक्ष मनोज तिवारी की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने कहा, 'वह हमेशा मां की तरह मेरा वेलकम करती थीं। दिल्ली हमेशा उन्हें मिस करेगी।' बड़ा सवाल: कौन होगा का अध्यक्ष? शीला दीक्षित का अंतिम संस्कार आज दिल्ली के निगम बोध घाट पर किया जाएगा। उनके पार्थिव शरीर को निजामुद्दीन स्थित आवास पर रविवार सुबह 11 बजकर 30 मिनट तक अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। शीला दीक्षित के निधन के बाद जहां एक ओर राजनीतिक खेमे में शोक की लहर दौड़ पड़ी है, वहीं कुछ लोगों की जुबान पर एक सवाल भी है। सवाल यह कि आखिर अब दिल्ली कांग्रेस का मुखिया कौन होगा। दरअसल, दिल्ली में विधानसभा चुनाव होने में कुछ ही महीने शेष हैं और ऐसे में पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के अचानक निधन से दिल्ली कांग्रेस के सामने एक ऐसे नेता की तलाश करने की चुनौती उत्पन्न हो गई है, जो उनकी जिम्मेदारी संभाल सके। शीला दीक्षित के निधन के बाद अब दिल्ली कांग्रेस इकाई के सामने दो चुनौतियां हैं, जिसमें पहली है नया नेता तलाशना और दूसरी पार्टी में एकजुटता कायम करना। नए नेता को दिल्ली इकाई को एकजुट करने की चुनौती से भी जूझना पड़ सकता है। यहां: ... और राजनीति में मिला था पहला मौका बता दें कि कांग्रेस पार्टी दिल्ली के आगामी विधानसभा चुनावों में उन्हें सीएम के चेहरे के तौर पर उतारने की तैयारी में भी थी। दिल्ली में कांग्रेस की सरकार जाने के बाद केरल की राज्यपाल भी रही थीं। इसके अलावा कांग्रेस ने यूपी विधानसभा चुनाव में उन्हें मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर भी पेश किया था। शीला दीक्षित को राजनीति में पहला बड़ा मौका तब मिला था, जब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें 1984 में अपने मंत्रिपरिषद में शामिल किया था तब शीला दीक्षित यूपी की कन्नौज लोकसभा सीट से संसद पहुंची थीं। केरल की राज्यपाल भी रहीं शीला के लिए राजनीति महज सत्ता हासिल करने का जरिया नहीं थी बल्कि आम लोगों से जुड़ने और उनकी समस्याओं को हल करने का माध्यम थी। विनोद दीक्षित से हुआ विवाह पंजाब के कपूरथला में गैर-राजनीतिक परिवार में 1938 में जन्मीं शीला को जीसस कॉन्वेंट में स्कूल की पढ़ाई की थी और उसके बाद मिरांडा हाउस कॉलेज से ग्रेजुएशन की थी। जुलाई, 1962 में शीला दीक्षित की शादी जवाहर लाल नेहरू के करीबी रहे उमा शंकर दीक्षित के नौकरशाह बेटे विनोद दीक्षित से हुई थी। उमा शंकर दीक्षित 1971 में इंदिरा गांधी सरकार में कैबिनेट मंत्री बने थे और उसके बाद वह कर्नाटक और पश्चिम बंगाल में गवर्नर भी रहे। 'शीला की लोकप्रियता से मेल नहीं खाता कोई चेहरा' एक नेता ने कहा, ‘नेताओं की मौजूदा जमात में कोई भी दीक्षित की लोकप्रियता से मेल नहीं खाता है। तीन कार्यकारी अध्यक्षों हारुन युसूफ, देवेंद्र यादव और राकेश लिलोठिया क्रमश: वरिष्ठ नेताओं जेपी अग्रवाल, एके वालिया और सुभाष चोपड़ा से कनिष्ठ है।’ नेता ने कहा, ‘दीक्षित के अचानक निधन से दिल्ली कांग्रेस बुरी तरह से प्रभावित हुई है।’ पढ़ें: अजय माकन ने दिया था इस्तीफा वर्ष 2013 के बाद से हर प्रमुख चुनाव में तीसरे स्थान पर रह रही कांग्रेस को 2019 के लोकसभा चुनाव में दूसरे स्थान पर रहकर आम आदमी पार्टी (आप) कुछ हद तक किनारे करने में सफल रही थी और उसे कुछ उम्मीद दिखाई दी थी। कांग्रेस पांच सीटों पर दूसरे स्थान पर रही थी। दीक्षित अगले वर्ष जनवरी-फरवरी में होने वाले विधानसभा चुनाव की तैयारी कर रही थीं। अब पार्टी को चुनाव से पहले संगठन का नेतृत्व करने के लिए एक नए नेता की तलाश करनी होगी। दिल्ली प्रदेश कांग्रेस समिति के पूर्व प्रमुख अजय माकन ने स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा दे दिया था।
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शीला के निधन से कांग्रेस के सामने महासंकट
Reviewed by Fast True News
on
July 21, 2019
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