सुभाष बाबू ही थे गुमनामी बाबा? पक्का नहीं
लखनऊ/अयोध्या अयोध्या के रामभवन में लंबे समय तक रहे उर्फ भगवान जी की पहचान तय करने के लिए बने जस्टिस विष्णु आयोग की रिपोर्ट को मंगलवार शाम यूपी कैबिनेट में पेश किया गया। इस रिपोर्ट में आयोग ने कहा है कि यह पता लगाना मुश्किल है कि गुमनामी बाबा असल में थे या नहीं। 2016 में बने इस आयोग की रिपोर्ट को अब यूपी विधानसभा के पटल पर रखा जाएगा। गुमनामी बाबा की मौत 18 सितंबर, 1985 को अयोध्या में हुई थी। आयोग की रिपोर्ट में कहा गया है कि बाबा की पहचान नहीं हो सकी है। हालांकि, आयोग ने गुमनामी बाबा की जो विशेषताएं बताई हैं, वह नेताजी सुभाष चंद्र बोस से काफी मिलती हैं। आयोग की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि गुमनामी बाबा अंग्रेजी, हिंदी व बंगाली जानते थे और उनके निवास से इन भाषाओं की कई किताबें मिलीं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि गुमनामी बाबा अयोध्या (तत्कालीन फैजाबाद) में तब तक ही थे, जब तक कि उनके नेताजी सुभाष चंद्र बोस होने की चर्चा शुरू नहीं हुई थी। जब समाज में गुमनामी बाबा को लेकर चर्चाएं शुरू हुईं, तो उन्होंने तत्काल अपना आवास बदल दिया। साल 2016 में बनाया गया था आयोग बता दें कि साल 2016 में इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर एक याचिका में गुमनामी बाबा के नेताजी सुभाष चंद्र बोस होने की संभावना जताई गई थी और इसके लिए जांच कराने की अपील भी की गई थी। कोर्ट ने याचिका पर तत्कालीन अखिलेश यादव सरकार को आदेश देते हुए एक आयोग के गठन का आदेश दिया था। इसके बाद एसपी सरकार ने ही जस्टिस विष्णु सहाय आयोग को इसकी जानकारी दी थी। बाद में इस कमीशन ने गुमनामी बाबा से जुड़े कई दस्तावेज इकट्ठा किए थे और अयोध्या के तमाम लोगों ने उनके बारे में बातचीत भी की थी।
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सुभाष बाबू ही थे गुमनामी बाबा? पक्का नहीं
Reviewed by Fast True News
on
July 23, 2019
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