पाक में कोर्ट ही कठघरे में, फैसलों का विरोध
नई दिल्लीक्या पाकिस्तान की न्यायपालिका अपनी विश्वसनीयनता खो चुकी है? वहां सर्वोच्च अदालत तक सौदा कर फैसला देती है? क्या सत्ता से प्रभावित न्यायपालिका की स्वतंत्रता खतरे में है? हमारे पड़ोसी मुल्क में ये सारे सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि वहां के पूर्व पीएम नवाज शरीफ की बेटी मरियम ने एक विडियो जारी किया है। मरियम के मुताबिक, इसमें जज कहते सुने जा रहे हैं कि उन्होंने शरीफ को दबाव में आकर सजा दी, जबकि उनके खिलाफ सबूत कमजोर थे। यह विडियो जज अरशद मलिक से जुड़ा है, जिन्होंने नवाज शरीफ को भ्रष्टाचार के मामले में 7साल की सजा सुनाई थी। हालांकि उन्होंने आरोपों को गलत बताया है। सरकार ने भी जांच के आदेश दे दिए हैं। पाक में यह पहला वाकया नहीं पाकिस्तान में न्यायपालिका पर लगे इस संगीन आरोप के बाद सियासत तेज हो गई है। वैसे हाल के वर्षों में यह कोई पहला मामला नहीं था, जब अदालत पर न्याय का सौदा करने के आरोप लगे हैं। जानकारों के अनुसार, हाल में कई विवादित फैसलों और सोशल मीडिया के उभरने के बाद इस तरह के आरोपों की बाढ़-सी आ गई है। न्यायपालिका की साख पूरी तरह समाप्त हो गई है। पिछले दिनों एक सीनियर सिटिजन ने पाकिस्तान के चीफ जस्टिस पर सीधा आरोप लगाया था कि उनके लंबित केस के निबटारे के लिए रिश्वत मांगी गई। आरोपों की जांच की जगह उस बुजुर्ग को कोर्ट से बेइज्जत करते हुए निकाल दिया गया था। इस घटना के बाद भी वहां न्यायपालिका की बहुत आलोचना हुई थी। मुशर्रफ के मामले में भी कोर्ट पर लगे आरोप कुछ महीने पहले एक युवती खादिजा सिद्दकी की हत्या के मामले में आरोपी को छोड़ देने के बाद भी पूरे पाकिस्तान में युवाओं ने न्यायपालिका के खिलाफ मोर्चा संभाला था। कहा गया कि कोर्ट ने दबाव में आकर आरोपी को छोड़ा था। बाद में आंदोलन भड़कने की आशंका बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप किया और मामले की दोबारा सुनवाई शुरू की। परवेज मुशर्रफ के मामले में भी न्यायपालिका पर कई बार आरोप लगे कि वह प्रभाव में आकर कभी नरम तो कभी गरम रुख अख्तियार कर रही है। मुश्किल में पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायपालिका को भी गिरती साख का अहसास है। यही कारण है कि पिछले साल वहां चीफ जस्टिस सकीब निसार ने एक के बाद एक ऐसे कई कदम उठाए थे, जिससे संदेश गया कि वह आम लोगों के हितों की ओर से मजबूती से लड़ना चाहते हैं। हालांकि अब नए सवाल उठने के बाद सारी कवायद फिर संदेह के घेरे में आ गई है। सैन्य तानाशाह के दबाव में भी आए फैसले सैनिक तानाशाहों के दबाव में फैसला देने की भी कई मिसालें रही हैं। संदिग्ध आरोपों पर ही पूर्व पीएम जुल्फिकार अली भुट्टो को 1979 में फांसी दे दी गई थी, क्योंकि सेना ऐसा चाहती थी। 2007 में तो सेना ने न्यायपालिका पर कब्जा करने के लिए कई जजों को नजरबंद तक करा दिया था। ऐसी परिस्थिति में स्वतंत्र न्यायपालिका की उम्मीद रखना बेमानी ही थी। नया ट्रेंड यह आया कि अब लोग खुलकर बोलने लगे हैं।
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पाक में कोर्ट ही कठघरे में, फैसलों का विरोध
Reviewed by Fast True News
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July 18, 2019
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