16 हजार फुट ऊंचे पहाड़ पर अब भी 'जिंदा' हैं विजयंत
नोएडा 16 हजार फुट की ऊंचाई पर पहुंचकर आज भी जब मैं उस मिट्टी को छूता हूं तो आंखें नम और धड़कन मंद जरूर हो जाती है, लेकिन सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है और सीना चौड़ा। वादियों की ठंडी हवा जब कानों को छूती हैं तो लगता है कि हर लहर में उसी बेटे की आवाज है जो थैंक यू पापा कह जाती है। यह बताते हुए शहीद उर्फ रॉबिन के पिता कर्नल (रिटायर्ड) वी. एन. थापर कुछ देर के लिए मौन हो जाते हैं और उनकी आंखें बीती बातें कहने लग जाती हैं। शहादत से पहले लिखी थी भावुक चिट्ठी थोड़ा रुक कर कर्नल थापर कहते हैं... करगिल को 20 साल हो चुके हैं पर लगता है जैसे कल की ही बात हो। रॉबिन पोस्टिंग पर गया है और छुट्टियों में जल्द घर लौटेगा। खैर... शहादत की नींद सोने वाले कहां लौटते हैं, इसलिए मैं ही चला जाता हूं उस जगह, जहां उसकी जोश-ए-जवानी की कहानी बिखरी पड़ी है। ऑपरेशन पर जाने से पहले रॉबिन ने चिट्ठी लिखी थी। इसमें लिखा था कि जब तक चिट्ठी आपको मिलेगी, मैं जिम्मेदारी निभाकर अप्सराओं के पास पहुंच चुका होऊंगा। हर साल पिता जाते हैं करगिल उसने कहा था कि आप इस जगह आकर जरूर देखना। बेटे के आग्रह को पूरा करने के लिए उन्होंने 2000 से कारगिल में विजयंत के शहादत स्थल पर जाने का सिलसिला शुरू किया। विजयंत की मां तृप्ता ने भी इसके लिए हौसला बढ़ाया। वे 28 जून से 3-4 दिन पहले करगिल पहुंच जाते हैं और उन्हीं तंबुओं में रहते हैं, जहां विजयंत रहता था। करगिल के विजय को 20 साल पूरे कै. विजयंत आर्मी की 2 राजपूताना राइफल रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट थे। मेजर पदमपाणि आचार्य, कै नेइकेझाकुओ केंगरूस और लेफ्टिनेंट विजयंत थापर के नेतृत्व में उनकी यूनिट ने 28 जून की रात को करगिल के द्रास सेक्टर की चोटी पर हमला बोला। 16 हजार फुट ऊंचाई पर दुश्मन से मुठभेड़ में तीन सैन्य अधिकारियों समेत कई जवान शहीद हो गए, पर वे चोटी को आजाद करा चुके थे। 26 जुलाई, 1999 को करगिल पर भारतीय सेना ने विजय पाई थी। इसके आज 20 साल पूरे हो रहे हैं।
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16 हजार फुट ऊंचे पहाड़ पर अब भी 'जिंदा' हैं विजयंत
Reviewed by Fast True News
on
July 25, 2019
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